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बिहार बना डिजिटल पावरहाउस! 5G कवरेज में कर्नाटक-यूपी को छोड़ा पीछे, गांव-गांव पहुंचा हाईस्पीड इंटरनेट

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बिहार ने 5जी नेटवर्क कवरेज में कर्नाटक और उत्तर प्रदेश को पीछे छोड़ दिया है। राज्य की 94.52% आबादी अब 5जी नेटवर्क से जुड़ चुकी है। जानिए ट्राई रिपोर्ट, भारत नेट योजना, गांवों तक इंटरनेट विस्तार और नेटवर्क चुनौतियों की पूरी रिपोर्ट।

पटना/आलम की खबर: कभी आधारभूत सुविधाओं और तकनीकी विकास के मामले में पिछड़े राज्यों की सूची में गिने जाने वाला बिहार अब डिजिटल क्रांति की नई कहानी लिख रहा है। मोबाइल इंटरनेट और हाईस्पीड नेटवर्क के क्षेत्र में राज्य ने ऐसा प्रदर्शन किया है जिसने देश के कई विकसित राज्यों को भी पीछे छोड़ दिया है। ताजा आंकड़ों के अनुसार बिहार की 94.52 प्रतिशत आबादी अब 5जी नेटवर्क की पहुंच में आ चुकी है। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि राष्ट्रीय औसत जहां 86.18 प्रतिशत है, वहीं आईटी और टेक्नोलॉजी हब कहे जाने वाले कर्नाटक में 5जी कवरेज केवल 79.92 प्रतिशत तक सीमित है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में भी यह आंकड़ा 85.25 प्रतिशत तक ही पहुंच पाया है। ऐसे में बिहार का यह प्रदर्शन देशभर में चर्चा का विषय बन गया है।राज्य में डिजिटल कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए पिछले कुछ वर्षों में योजनाबद्ध तरीके से काम किया गया। केवल बड़े शहरों या जिला मुख्यालयों तक नेटवर्क सीमित रखने के बजाय गांवों और दूरदराज के इलाकों में भी इंटरनेट पहुंचाने पर विशेष जोर दिया गया। यही वजह है कि आज बिहार के ग्रामीण इलाकों में भी लोग वीडियो कॉलिंग, ऑनलाइन पढ़ाई, डिजिटल भुगतान, टेलीमेडिसिन और हाईस्पीड इंटरनेट सेवाओं का तेजी से इस्तेमाल कर रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि इसी गति से नेटवर्क विस्तार जारी रहा तो आने वाले वर्षों में बिहार डिजिटल इकोनॉमी के क्षेत्र में और मजबूत स्थिति में पहुंच सकता है।

बिहार की इस उपलब्धि के पीछे केन्द्र सरकार की भारत नेट परियोजना को भी बड़ी वजह माना जा रहा है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य गांवों तक ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क पहुंचाकर हाईस्पीड इंटरनेट उपलब्ध कराना था। बिहार में इस परियोजना के तहत करीब 8,860 ग्राम पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ा गया। जानकारी के अनुसार इस पर 812 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च की गई। इस पहल का सीधा फायदा ग्रामीण आबादी को मिला और गांवों में इंटरनेट की उपलब्धता पहले की तुलना में काफी बेहतर हुई। अब पंचायत स्तर तक इंटरनेट पहुंचने से सरकारी सेवाओं, ऑनलाइन आवेदन, बैंकिंग और डिजिटल शिक्षा को भी मजबूती मिली है।

विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार में 5जी विस्तार की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि यहां नेटवर्क कंपनियों ने केवल व्यावसायिक शहरों पर ध्यान केंद्रित नहीं किया, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने की कोशिश की। जियो, एयरटेल और अन्य कंपनियों ने गांवों तक टावर लगाने और नेटवर्क क्षमता बढ़ाने पर काम किया। इसका परिणाम यह हुआ कि अब कई छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों में भी लोगों को तेज इंटरनेट स्पीड मिलने लगी है। डिजिटल इंडिया मिशन के तहत बिहार की भागीदारी अब पहले से कहीं ज्यादा मजबूत दिखाई दे रही है।

आज विश्व दूरसंचार दिवस के अवसर पर बिहार की यह उपलब्धि और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। हर वर्ष 17 मई को विश्व दूरसंचार दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरुआत वर्ष 1969 में अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ यानी आईटीयू की स्थापना की स्मृति में की गई थी। इस दिवस का उद्देश्य लोगों को सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार के महत्व के प्रति जागरूक करना है। साथ ही डिजिटल विभाजन को समाप्त कर तकनीक के जरिए लोगों को जोड़ने का संदेश देना भी इसका प्रमुख लक्ष्य है। ऐसे समय में बिहार का तेजी से बढ़ता 5जी नेटवर्क यह संकेत देता है कि राज्य अब तकनीकी बदलावों को तेजी से स्वीकार कर रहा है।

हालांकि तस्वीर पूरी तरह सकारात्मक नहीं कही जा सकती। राज्य के कई इलाकों में अब भी नेटवर्क से जुड़ी गंभीर समस्याएं बनी हुई हैं। विशेष रूप से सीमावर्ती ग्रामीण क्षेत्रों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर मोबाइल नेटवर्क की स्थिति कमजोर बताई जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार बिहार के राष्ट्रीय राजमार्गों पर लगभग 1750 किलोमीटर क्षेत्र में 424 ऐसे स्थान हैं जहां मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं है। इससे यात्रियों और स्थानीय लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। कई जगहों पर कॉल ड्रॉप और इंटरनेट स्पीड की समस्या लगातार बनी हुई है।

तकनीकी विशेषज्ञ बताते हैं कि इस समस्या की सबसे बड़ी वजह मोबाइल टावरों के बीच अधिक दूरी होना है। दूरसंचार मानकों के अनुसार शहरों में टावरों के बीच दूरी 500 से 800 मीटर होनी चाहिए, लेकिन कई जगह यह दूरी 1.5 से 2 किलोमीटर तक पहुंच जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और खराब है जहां कई इलाकों में टावरों के बीच दूरी 3 से 5 किलोमीटर तक है, जबकि कुछ क्षेत्रों में यह 7 से 8 किलोमीटर तक पहुंच जाती है। ऐसी स्थिति में नेटवर्क कमजोर होना स्वाभाविक माना जा रहा है।

ट्राई द्वारा समस्तीपुर जिले में कराए गए इंडिपेंडेंट ड्राइव टेस्ट ने भी नेटवर्क की वास्तविक स्थिति को उजागर किया। रिपोर्ट के मुताबिक बीएसएनएल का प्रदर्शन सबसे कमजोर पाया गया। बीएसएनएल नेटवर्क से केवल 36.89 प्रतिशत कॉल ही सफलतापूर्वक लग सकीं जबकि 10.04 प्रतिशत कॉल ड्रॉप हो गईं। दूसरी ओर एयरटेल और जियो ने 99 प्रतिशत से अधिक कॉल सफलता दर दर्ज की। इंटरनेट स्पीड के मामले में भी बड़ा अंतर सामने आया। जियो की डाउनलोड स्पीड 158 एमबीपीएस और एयरटेल की 101 एमबीपीएस रही जबकि बीएसएनएल केवल 12 एमबीपीएस की स्पीड दे पाया। इससे साफ है कि निजी कंपनियों की तुलना में सरकारी नेटवर्क को अब भी बड़े सुधार की जरूरत है।ट्राई की रिपोर्ट में सीवान, रोहतास, कैमूर, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर और सीमावर्ती जिलों में नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर को और मजबूत करने की सिफारिश की गई है। इसके बावजूद बिहार की तेजी से बढ़ती 5जी पहुंच यह साबित कर रही है कि राज्य अब डिजिटल विकास की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। आने वाले समय में यदि नेटवर्क गुणवत्ता और टावर इंफ्रास्ट्रक्चर में और सुधार किया गया तो बिहार देश के सबसे मजबूत डिजिटल राज्यों में अपनी जगह बना सकता है।

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